कभी किसी अन्तिम विदाई को देखूँ
तो मुझे महसूस होता है कि मैं रिक्त हूँ
बहुत संवेदनाए है मेरी ऐसी जिसे बहा देना चाहती हूँ
उस रोज जब मैं तुझसे आखिरी बार मिली थी
तुझे दुबारा देखने की ख्वाहिश ने मुझे बेचैन रखा था
पर कितनी मंहगी सी इच्छा थी मेरी
कि खुदा भी हाथ जोड़कर बैठा मेरे सामने
तेरी अलविदा कहने की घड़ी थी
और मेरी आँखें अपलक तुझे निहार रही थी
तुझे शीघ्रता थी जाने की और मैं रोकने का प्रयास करती
तेरे न होने की शुन्यता और मेरे मन की रिक्तता
मैं भरसक प्रयास करती हूँ इस व्योम से बाहर निकलने का
पर फिर कोई दिख जाता है अन्तिम पथ पर अग्रसरित
और मैं रह जाती रिक्त रिक्त रिक्त
तो मुझे महसूस होता है कि मैं रिक्त हूँ
बहुत संवेदनाए है मेरी ऐसी जिसे बहा देना चाहती हूँ
उस रोज जब मैं तुझसे आखिरी बार मिली थी
तुझे दुबारा देखने की ख्वाहिश ने मुझे बेचैन रखा था
पर कितनी मंहगी सी इच्छा थी मेरी
कि खुदा भी हाथ जोड़कर बैठा मेरे सामने
तेरी अलविदा कहने की घड़ी थी
और मेरी आँखें अपलक तुझे निहार रही थी
तुझे शीघ्रता थी जाने की और मैं रोकने का प्रयास करती
तेरे न होने की शुन्यता और मेरे मन की रिक्तता
मैं भरसक प्रयास करती हूँ इस व्योम से बाहर निकलने का
पर फिर कोई दिख जाता है अन्तिम पथ पर अग्रसरित
और मैं रह जाती रिक्त रिक्त रिक्त

बहुत सुन्दर
ReplyDeleteधन्यवाद प्रभात जी आपने मेरा ब्लाग देखा उसका आभार
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