Saturday, 16 September 2017

प्रेम की नींव पर

मैं व्याप्त हूँ विश्वास की दहलीज पर
मेरा विस्तार है व्योम के हर छोर पर
मैं महक हूँ पुष्प के हर पंखुड़ी की
मैं छाँव हूँ हर वृक्ष की नींव पर
मैं जीवंत हूँ हर चेतना पर
मेरा अस्तित्व है हर आत्मा पर
मैं सुख में भी मौजूद हूँ दुख में भी मेरा वजूद
मुझसे ही रोशन अम्बर धरा का प्रांगण
न उम्र मेरी कोई न कोई मेरा आखिरी दिन
मैं पैदा तो हुआ हूँ पर मृत्यु मेरी लिखी नहीं
मैं हूँ तो तुम्हारे भीतर ही महसूस नही कर पायें
प्रेम हूँ मैं रंज की दुनिया का किसी को तो नजर आयें

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