Tuesday, 19 September 2017

कोई भ्रम या मेरा स्वप्न

किसी गजगामिनी सी सौन्दर्य की प्रतिमा
किसी नदिया की कोई पवित्र सी धारा
तुम अप्रतिम हो या कोई रुप की प्रेयसी
तुम यथार्थ के पटल पर रुप की आभा
संकुचित सी किसी छुईमुई के पौधे सी
तुम मृगनयनी सदृश किसी की छवि
अभिलाषा मेरे ऩयनों की तुम
मेरे विराट मन की कोई परिभाषा
कोई उपमा भी गर दूँ तो किसके जैसी दूँ
तुम सबसे परे मेरे स्वप्न के झिलमिल प्रांगण में
चन्द्र तारों से घिरे अन्नत आकाश में विचरण करती  श्याम की बाँसुरी के जैसी कोई मधुर ध्वनि बजती तुम
यथार्थ पटल में अस्तित्व ही नहीं तुम्हारा
साधना से परे तुम हो
किंचित कोई स्वप्न या मेरा भ्रम

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