Monday, 7 October 2024

श्रीरामचरितमानस


काव्य ग्रन्थ, गद्य ग्रन्थ, किसी भी समाज की संस्कृति की आधारशिला होती है, संस्कृति, संस्कार, त्याग, समर्पण समाज के प्रारूप को दर्शाते है, प्रभु रघुनन्दन श्रीराम भारतीय समाज के पटल पर अंकित एक दैदिप्यामान आभा है, जिसकी रश्मियाँ सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को आलोकित कर रही है।
महान संत बाबा गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित काव्य विधा श्री रामचरितमानस समस्त दैहिक-दैविक-भौतिक तापों से उत्पन्न होने वाली पीड़ा का दहन करने वाली एक रिमझिम फुहार है। परिवार का प्रारूप, उसमे होने वाले हर्ष,संताप को दर्शाने वाली एक अनमोल कृति है.श्री हरि नारायण के अवतार श्रीराम प्रभु के  मातृ- पितृ प्रेम को दर्शाती एक  त्याग, समर्पण, प्रेम की अनुपम काव्य कथा है। प्रभु श्रीराम का आचरण, उनका जीवन चरित, और उनके व्यवहार, प्रवृति के अनुरूप उनके भ्राताओं का समरुप व्यवहार है,श्रीरामचरितमानस।

 श्रीराम प्रभु से जुड़ा हर पात्र त्याग,  निष्ठा, समर्पण, भक्ति, आस्था, विश्वास से परिप्लावित है, द्वेष, आसक्ति, लोभ,मोह का कोई स्थान ही नहीं। रघुनाथ से जुड़ा हर कोई अपने अपने स्थान पर रहकर केवल जनहित, लोकहित को अपना परम कर्तव्य मानकर जीवन रथ पर आरुढ़ हो केवल तप कर रहा हैं।

माँ जानकी एक राजा की राजकुमारी, चक्रवर्ती सम्राट और साम्राज्य की कुलवधु होकर भी अपने स्वामी के चरण कमलों का अनुसरण करते हुए वन गमन को चली गयी, भ्रात लक्ष्मण सेवक के कर्तव्य को सर्वोपरि मानकर रघुवर के पद चिन्हो को धारण कर वन चले गए,भरत के जैसा अनुपम त्याग का उदाहरण शायद ही कही देखने को मिले जिन्होंने राजधानी में रहकर वल्कल वस्त्र धारण कर 14 वर्षो तक प्रतीक्षा की, लखन प्रिय उर्मिला पति के कर्तव्य पथ पर जिसने अपने जीवन स्वपनों  की आहुति दें दी।

माँ शबरी का श्रीराम प्रभु में परम विश्वास उसकी प्रतीक्षा , विभीषण का श्री हरि चरणों में अनुराग, पक्षीराज जटायु का श्री राम भक्ति करते हुए माँ जानकी की राक्षस रावण से रक्षा करते हुए अपने प्राणों का बलिदान,बजरंगबली हनुमान की भक्ति  का सार है, श्रीरामचरितमानस। बजरंगबली तो एकमात्र ऐसे पात्र है, जिन्होंने स्वहित की अपने जीवन यज्ञ में आहुति दें दी, उनका परम कर्तव्य, उनका प्रेम, अनुराग उनका समर्पण केवल अपने उपास्य के लिए,  केवल श्रीराम। भक्ति का ऐसा चरमोत्कर्ष उदाहरण शायद ही कही हमें देखने को मिले, भक्ति और शक्ति के शिरोमणि श्री हनुमान जी।

भगवदगीता अगर कर्म करते हुए भगवद आचरण करने की शिक्षा देती है, तो श्रीरामचरितमानस पारिवारिक जीवन में त्याग, निष्ठा, प्रेम और समर्पण  का मार्ग दिखाती है। श्रीराम को जो भी मिला, उन्होंने उसे सहर्ष उसे स्वीकारा, सतत जीवन में वे पीड़ा , वन के दुखो और कष्टों को सहकर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम बन गए।

संत श्री तुलसीदास बाबा ने यह अमर काव्य कृति लिखकर लोक मंगल की जो अमर गंगा इस पृथ्वी पर प्रवाहित की है, वास्तव तुलसीदास जी भगीरथ है, जो श्रीराम रूपी गंगा को श्री रामचरितमानस के रूप में लाकर समस्त जीव जगत को इस अंध कूप से तारने हेतु एक ब्रह्म नौका प्रदान की है.



सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।
सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान
माँ शबरी का परम विश्वास उसकी प्रतीक्षा , विभीषण का श्री हरि चरणों में अनुराग श्री बजरंगबली हनुमान की भक्ति  का सार है, श्रीरामचरितमानस। बजरंगबली तो एकमात्र ऐसे पात्र है, जिन्होंने स्वहित की अपने जीवन यज्ञ में आहुति दें दी, उनका परम कर्तव्य, उनका प्रेम, अनुराग उनका समर्पण केवल अपने उपास्य के लिए,  केवल श्रीराम। भक्ति का ऐसा चरमोत्कर्ष उदाहरण शायद ही कही हमें देखने को मिले, भक्ति और शक्ति के शिरोमणि श्री हनुमान जी।

भगवदगीता अगर कर्म करते हुए भगवद आचरण करने की शिक्षा देती है, तो श्रीरामचरितमानस पारिवारिक जीवन में त्याग, निष्ठा, प्रेम और समर्पण  का मार्ग दिखाती है। श्रीराम को जो भी मिला, उन्होंने उसे सहर्ष उसे स्वीकारा, सतत जीवन में वे पीड़ा , वन के दुखो और कष्टों को सहकर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम बन गए।

संत श्री तुलसीदास बाबा ने यह अमर काव्य कृति लिखकर लोक मंगल की जो अमर गंगा इस पृथ्वी पर प्रवाहित की है, वास्तव तुलसीदास जी भगीरथ है, जो श्रीराम रूपी गंगा को श्री रामचरितमानस के रूप में लाकर समस्त जीव जगत को इस अंध कूप से तारने हेतु एक ब्रह्म नौका प्रदान की है.

सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।
सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान

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