Monday, 7 October 2024

प्रेम का अनुरागी मन

तुम असिमित विस्तार हो मेरे स्वप्नों का 
अधूरी आकांक्षाएं लिये मेरे बोझिल नैन 
किसी निशब्द रात्रि के साथ तुम्हारे स्वप्नों के प्रांगण में उतरकर कोई पूर्ण होते ख्वाब को देखकर ठहर गये हो
 श्वेत चाँदनी सी जो तुम्हारी पैरों की नूपुर
 मेरे मन के आँगन में एक मधुर स्वर की झंकार करते 
मेरे प्रेम को पल्लवित करती
मैं अलसायी आँखों को मूंदकर 
अपने अनकहे शब्दों को अधरों में समेट लेता हूँ 
 तुम्हारे प्रेम का अनुरागी मन 
चंचलायमान होकर भी कितना स्थिर है 
स्थिरता तुम्हारी कितनी प्रवाहपूर्ण है और 
मुझमें वेग होकर भी कितना तटस्थ हूँ मैं
 प्रेम का प्रवाह कितना स्थितप्रज्ञ है 
जो बह रहा है किन्तु स्थिर है

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