अधूरी आकांक्षाएं लिये मेरे बोझिल नैन
किसी निशब्द रात्रि के साथ
तुम्हारे स्वप्नों के प्रांगण में उतरकर
कोई पूर्ण होते ख्वाब को देखकर ठहर गये हो
श्वेत चाँदनी सी जो तुम्हारी पैरों की नूपुर
मेरे मन के आँगन में एक मधुर स्वर की झंकार करते
मेरे प्रेम को पल्लवित करती
मैं अलसायी आँखों को मूंदकर
अपने अनकहे शब्दों को अधरों में समेट लेता हूँ
तुम्हारे प्रेम का अनुरागी मन
चंचलायमान होकर भी कितना स्थिर है
स्थिरता तुम्हारी कितनी प्रवाहपूर्ण है
और
मुझमें वेग होकर भी कितना तटस्थ हूँ मैं
प्रेम का प्रवाह कितना स्थितप्रज्ञ है

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