Monday, 7 October 2024

हर किसान आज होरी है

हिन्दी साहित्य के ध्रुव के रुप में प्रेमचंद की कालजयी रचनाएँ वर्तमान जीवन के यथार्थ के रुप में परिलक्षित होती है। एक कहानीकार के रुप में उनकी कहानियाँ आदर्शवादी दृष्टिकोण लिये समाहित है। पर उनकी अन्तिम रचना
के रुप में गोदान को अगर हम देखें, तो उसमें आदर्शवाद के रुप में होरी और धनिया अपने धर्म और अपनी गृहस्थी को मर्यादित रखने का जो चरित्र दोनों का है।कहानी का अन्त उतना ही आदर्श के पथ की किकर्तव्यमिमूढ़ता को प्रदर्शित करता ।
होरी जो जीवन पर्यन्त गाय को पालने की जीजिविषा के साथ जीता रहा ,मृत्यु तक उसका यह स्वप्न एक स्वप्न ही बनकर रह गया। यहाँ तक जब उसकी मृत्यु पश्चात गौदान की बात कही गयी, जो धनिया के लिये असम्भव था,उसका कुछ सिक्के देते हुए ये कहना कि यही इनका गौदान है।
प्रेमचंद ने गौदान में भारतीय किसान की जिस मार्मिकता को वर्णित किया है, वह बहुत ही करुण है।
आज भी होरी जैसे किसान है,जो ऋण की अग्नि में मजबूर है जलते रहने को।जो किसी न किसी तरह उनको मृत्यु के पास ले जा रही है,आत्महत्या या ऋण न चुका पाने का भय उनके जीवन को विष की भाँति शनैः शनैः निगल रहा है।
प्रेमचंद के गोदान में भारतीय किसान की पीड़ा किसी प्रसव पीड़ा से कम नही दिखाई पड़ती।जो वर्तमान किसान की भी दशा को वर्णित कर रही है। किसान की यह दशा अभी कब तक यूंही जारी रहेगी ,इसका भी समुद्र मंथन होना जरूरी है।

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