Monday, 2 October 2017

इंसा होने की शर्त

तुम धर्म जाति की बात करो
मैं इंसा होने की शर्त लगाता हूँ
तुम ख्वाहिश रखो सत्ता की
मैं रोटी की खोज में जाता हूँ
तुम नीति नियम की बात करो
मैं उजड़ों की बस्ती बसाता हूँ
तुम निंदा कटाक्ष के वचन बुनो
मैं पीड़ा के दंश मिटाता हूँ
मन्दिर मस्जिद की बात करो
मैं मानव का धर्म बताता हूँ
तुम अधिकारों का मार्ग रचो
मैं कर्तव्य पथ में जाता हूँ
तुम सागर सा खारा बन जाओ
मैं नीर नदी का बन जाता हूँ
तुम व्यापारी बन जाओ
मैं कृषक बन अन्न उगाता हूँ
तुम जज बनकर तो न्याय करो
मैं गीता पर हाथ रख कसम खाता हूँ


Thursday, 21 September 2017

अन्तिम विदाई

कभी किसी अन्तिम विदाई को देखूँ
तो मुझे महसूस होता है कि मैं रिक्त हूँ
बहुत संवेदनाए है मेरी ऐसी जिसे बहा देना चाहती हूँ
उस रोज जब मैं तुझसे आखिरी बार मिली थी
तुझे दुबारा देखने की ख्वाहिश ने मुझे बेचैन रखा था
पर कितनी मंहगी सी इच्छा थी मेरी
कि खुदा भी हाथ जोड़कर बैठा मेरे सामने
तेरी अलविदा कहने की घड़ी थी
और मेरी आँखें अपलक तुझे निहार रही थी
तुझे शीघ्रता थी जाने की और मैं रोकने का प्रयास करती
तेरे न होने की शुन्यता और मेरे मन की रिक्तता
मैं भरसक प्रयास करती हूँ इस व्योम से बाहर निकलने का
पर फिर कोई दिख जाता है अन्तिम पथ पर अग्रसरित
और मैं रह जाती रिक्त रिक्त रिक्त

Tuesday, 19 September 2017

कोई भ्रम या मेरा स्वप्न

किसी गजगामिनी सी सौन्दर्य की प्रतिमा
किसी नदिया की कोई पवित्र सी धारा
तुम अप्रतिम हो या कोई रुप की प्रेयसी
तुम यथार्थ के पटल पर रुप की आभा
संकुचित सी किसी छुईमुई के पौधे सी
तुम मृगनयनी सदृश किसी की छवि
अभिलाषा मेरे ऩयनों की तुम
मेरे विराट मन की कोई परिभाषा
कोई उपमा भी गर दूँ तो किसके जैसी दूँ
तुम सबसे परे मेरे स्वप्न के झिलमिल प्रांगण में
चन्द्र तारों से घिरे अन्नत आकाश में विचरण करती  श्याम की बाँसुरी के जैसी कोई मधुर ध्वनि बजती तुम
यथार्थ पटल में अस्तित्व ही नहीं तुम्हारा
साधना से परे तुम हो
किंचित कोई स्वप्न या मेरा भ्रम

Saturday, 16 September 2017

प्रेम की नींव पर

मैं व्याप्त हूँ विश्वास की दहलीज पर
मेरा विस्तार है व्योम के हर छोर पर
मैं महक हूँ पुष्प के हर पंखुड़ी की
मैं छाँव हूँ हर वृक्ष की नींव पर
मैं जीवंत हूँ हर चेतना पर
मेरा अस्तित्व है हर आत्मा पर
मैं सुख में भी मौजूद हूँ दुख में भी मेरा वजूद
मुझसे ही रोशन अम्बर धरा का प्रांगण
न उम्र मेरी कोई न कोई मेरा आखिरी दिन
मैं पैदा तो हुआ हूँ पर मृत्यु मेरी लिखी नहीं
मैं हूँ तो तुम्हारे भीतर ही महसूस नही कर पायें
प्रेम हूँ मैं रंज की दुनिया का किसी को तो नजर आयें

Thursday, 14 September 2017

यक्ष प्रश्न

एक प्रश्न है यक्ष ही समझ लीजिए
जन्म से लेकर वर्तमान तक
हम अपने ख्वाबों के पुलिन्दे लेकर
यहाँ से वहाँ भटक रहे है
सांसो का बोझ लेकर जीवित है
कोई ख्वाब की उड़ान गर पूरी हो
तो जीवन का उद्देश्य ही सफल हो जाये
घर से निकलते ही मंजिल मिल जाये
किसी  घोर निराशा सी जो कही जाती नहीं
वक्त के थपेड़ो के साथ
मैं भी चल पड़ी
किसी इरादे के साथ