कलम की तारीफ में अगर किसी का नाम मेरे जेहन में आयें तो यकीनन वो प्रेमचंद ही है।संवेदनशीलता के जज्बे को जिस गहराई से उन्होंने उकेरा है, उसका कोई सानी नहीं है।आदर्शों के महल को उनकी कहानियों में स्पष्ट देखा जा सकता है।
आप उनकी कहानियों को पढ़ते हुए अपने नेत्रों को विश्राम कदापि नही दें सकते,कभी ईदगाह का हामिद तो कभी मंत्र का बूढ़ा भगत आपकी आँखों से बहता हुआ बाहर आ जाएगा।
आज आपको हामिद से मिलवाते है ,वही ईदगाह का हामिद। पाँच या छह वर्ष का बालक लेकिन यकीन मानिये विवेक और नैतिकता में आपको हरा देगा।
प्रेमचंद ने जिस चरित्र को अपने हाथों से उकेरना शुरु कर दिया ,फिर वह किरदार तो ऐतिहासिक हो ही जाएगा।माता पिता से जिसका बचपन महरुम हो।अपनी दादी में ही जिसकी दुनिया हो,ऐसे बालक को गढ़ पाना आसान नहीं है।माँ पिता जिसके अल्लाह को प्यारे हो गये,लेकिन यह सच उसे पता नहीं पर उसकी आशा कहती है ,उसके अम्मी अब्बू जरुर आएँगे।यही बालकों का हुनर है कि वे निराशा नहीं रखते। ईद का मुबारक मौका है, और बच्चों की तरह हामिद भी बहुत खुश है,पर दादी आँसुओं के समुद्र को अपने अन्दर छुपाएं सोच रही है कि त्योहार में हामिद की खुशियों को कहां से खरीद कर लाऊँ,जो ईद की खुशी को सेवई जैसा मीठा कर दें। ईद के जश्न में जाने से पहले उसने तीन पैसे हामिद के हाथ में खुदा की रहमत की तरह रखें,हामिद की खुशी भी किसी ऩूर की तरह चमक रही थी। मेले में और बच्चों की तरह हामिद भी तलाश रहा था,कुछ ऐसा जिसकी कीमत उसकी खुशी से ज्यादा न हो,पर प्रेमचंद का हामिद कोई मामूली किरदार नहीं जो कुछ भी खरीद लेगा। जश्न के बाद जब बच्चे घर जाने लगे,तो बर्तनो की दुकान में हामिद को कुछ ऐसा मिल गया जिसके बारे में आप या हम भी न सोच सकें,जहाँ दूसरे बच्चे खेल खिलौने के साथ लौट रहे थे,वही हामिद ने अपनी दादी को याद करते हुए सोचा कि चूल्हे से रोटी उतारते हुए उसकी दादी की उँगलियाँ जल जाती है,ऐसे में अगर चिमटा खरीदकर ले जाउंगा तो दादी खुश हो जाएगी ,और दुआएं देगी।
एक बालपन को समझ पाना संभवतः हमारे लिये मुश्किल है,पर प्रेमचंद ने शायद बालक के विवेक को पराकाष्ठा की जिस ऊँचाई तक पहुंचा दिया ,उसकी कोई तुलना नहीं। हामिद की सोच किसी दार्शनिक की सोच को भी परास्त करती दिखाई देती है.
वर्तमान परिवेश में अगर हम इस कहानी को उतारेे तो जाने कितने हामिद आज भी होंगे जो ईद के जश्न को तरसते होंगे। हामिद का किरदार विवेक और समझदारी का सम्मिश्रण है। प्रेमचंद के पात्र एक आदर्श को प्रस्तुत करते है। हामिद, ईद का चाँद है जो हजारों में मुश्किल से मिलता है।
चलिये तलाश करे एक नये हामिद की जो विवेक का और आदर्शों का प्रतिमान स्थापित करें। चिमटा खरीदने की समझ हो पर अपना बचपन की ख्वाहिशो को समेटना न पड़े।
आप उनकी कहानियों को पढ़ते हुए अपने नेत्रों को विश्राम कदापि नही दें सकते,कभी ईदगाह का हामिद तो कभी मंत्र का बूढ़ा भगत आपकी आँखों से बहता हुआ बाहर आ जाएगा।
आज आपको हामिद से मिलवाते है ,वही ईदगाह का हामिद। पाँच या छह वर्ष का बालक लेकिन यकीन मानिये विवेक और नैतिकता में आपको हरा देगा।
प्रेमचंद ने जिस चरित्र को अपने हाथों से उकेरना शुरु कर दिया ,फिर वह किरदार तो ऐतिहासिक हो ही जाएगा।माता पिता से जिसका बचपन महरुम हो।अपनी दादी में ही जिसकी दुनिया हो,ऐसे बालक को गढ़ पाना आसान नहीं है।माँ पिता जिसके अल्लाह को प्यारे हो गये,लेकिन यह सच उसे पता नहीं पर उसकी आशा कहती है ,उसके अम्मी अब्बू जरुर आएँगे।यही बालकों का हुनर है कि वे निराशा नहीं रखते। ईद का मुबारक मौका है, और बच्चों की तरह हामिद भी बहुत खुश है,पर दादी आँसुओं के समुद्र को अपने अन्दर छुपाएं सोच रही है कि त्योहार में हामिद की खुशियों को कहां से खरीद कर लाऊँ,जो ईद की खुशी को सेवई जैसा मीठा कर दें। ईद के जश्न में जाने से पहले उसने तीन पैसे हामिद के हाथ में खुदा की रहमत की तरह रखें,हामिद की खुशी भी किसी ऩूर की तरह चमक रही थी। मेले में और बच्चों की तरह हामिद भी तलाश रहा था,कुछ ऐसा जिसकी कीमत उसकी खुशी से ज्यादा न हो,पर प्रेमचंद का हामिद कोई मामूली किरदार नहीं जो कुछ भी खरीद लेगा। जश्न के बाद जब बच्चे घर जाने लगे,तो बर्तनो की दुकान में हामिद को कुछ ऐसा मिल गया जिसके बारे में आप या हम भी न सोच सकें,जहाँ दूसरे बच्चे खेल खिलौने के साथ लौट रहे थे,वही हामिद ने अपनी दादी को याद करते हुए सोचा कि चूल्हे से रोटी उतारते हुए उसकी दादी की उँगलियाँ जल जाती है,ऐसे में अगर चिमटा खरीदकर ले जाउंगा तो दादी खुश हो जाएगी ,और दुआएं देगी।
एक बालपन को समझ पाना संभवतः हमारे लिये मुश्किल है,पर प्रेमचंद ने शायद बालक के विवेक को पराकाष्ठा की जिस ऊँचाई तक पहुंचा दिया ,उसकी कोई तुलना नहीं। हामिद की सोच किसी दार्शनिक की सोच को भी परास्त करती दिखाई देती है.
वर्तमान परिवेश में अगर हम इस कहानी को उतारेे तो जाने कितने हामिद आज भी होंगे जो ईद के जश्न को तरसते होंगे। हामिद का किरदार विवेक और समझदारी का सम्मिश्रण है। प्रेमचंद के पात्र एक आदर्श को प्रस्तुत करते है। हामिद, ईद का चाँद है जो हजारों में मुश्किल से मिलता है।
चलिये तलाश करे एक नये हामिद की जो विवेक का और आदर्शों का प्रतिमान स्थापित करें। चिमटा खरीदने की समझ हो पर अपना बचपन की ख्वाहिशो को समेटना न पड़े।





