Monday, 7 October 2024

दादी के चिमटे में हामिद की ईद

कलम की तारीफ में अगर किसी का नाम मेरे जेहन में आयें तो यकीनन वो प्रेमचंद ही है।संवेदनशीलता के जज्बे को जिस गहराई से उन्होंने उकेरा है, उसका कोई सानी नहीं है।आदर्शों के महल को उनकी कहानियों में स्पष्ट देखा जा सकता है।
आप उनकी कहानियों को पढ़ते हुए अपने नेत्रों को विश्राम कदापि नही दें सकते,कभी ईदगाह का हामिद तो कभी मंत्र का बूढ़ा भगत आपकी आँखों से बहता हुआ बाहर आ जाएगा।
आज आपको हामिद से मिलवाते है ,वही ईदगाह का हामिद। पाँच या छह वर्ष का बालक लेकिन यकीन मानिये विवेक और नैतिकता में आपको हरा देगा।
प्रेमचंद ने जिस चरित्र को अपने हाथों से उकेरना शुरु कर दिया ,फिर वह किरदार तो ऐतिहासिक हो ही जाएगा।माता पिता से जिसका बचपन महरुम हो।अपनी दादी में ही जिसकी दुनिया हो,ऐसे बालक को गढ़ पाना आसान नहीं है।माँ पिता जिसके अल्लाह को प्यारे हो गये,लेकिन यह सच उसे पता नहीं पर उसकी आशा कहती है ,उसके अम्मी अब्बू जरुर आएँगे।यही  बालकों का हुनर है कि वे निराशा नहीं रखते। ईद का मुबारक मौका है, और बच्चों की तरह हामिद भी बहुत खुश है,पर दादी आँसुओं के समुद्र को अपने अन्दर छुपाएं सोच रही है कि त्योहार में हामिद की खुशियों को कहां से खरीद कर लाऊँ,जो ईद की खुशी को सेवई जैसा मीठा कर दें। ईद के जश्न में जाने से पहले उसने तीन पैसे हामिद के हाथ में खुदा की रहमत की तरह रखें,हामिद की खुशी भी किसी ऩूर की तरह चमक रही थी। मेले में और बच्चों की तरह हामिद भी तलाश रहा था,कुछ ऐसा जिसकी कीमत उसकी खुशी से ज्यादा न हो,पर प्रेमचंद का हामिद कोई मामूली किरदार नहीं जो कुछ भी खरीद लेगा। जश्न के बाद जब बच्चे घर जाने लगे,तो बर्तनो की दुकान में हामिद को कुछ ऐसा मिल गया जिसके बारे में आप या हम भी न सोच सकें,जहाँ दूसरे बच्चे खेल खिलौने के साथ लौट रहे थे,वही हामिद ने अपनी दादी को याद करते हुए सोचा कि चूल्हे से रोटी उतारते हुए उसकी दादी की उँगलियाँ जल जाती है,ऐसे में अगर चिमटा खरीदकर ले जाउंगा तो दादी खुश हो जाएगी ,और दुआएं देगी।
एक बालपन को समझ पाना संभवतः हमारे लिये मुश्किल है,पर प्रेमचंद ने शायद बालक के विवेक को पराकाष्ठा  की जिस ऊँचाई तक पहुंचा दिया ,उसकी कोई तुलना नहीं। हामिद की सोच किसी दार्शनिक की सोच को भी परास्त करती दिखाई देती है.
वर्तमान परिवेश में अगर हम इस कहानी को उतारेे तो जाने कितने हामिद आज भी होंगे जो ईद के जश्न को तरसते होंगे। हामिद का किरदार विवेक और समझदारी का सम्मिश्रण है। प्रेमचंद के पात्र एक आदर्श को प्रस्तुत करते है। हामिद, ईद का चाँद है जो हजारों में मुश्किल से मिलता है।
चलिये तलाश करे एक नये हामिद की जो विवेक का और आदर्शों का प्रतिमान स्थापित करें। चिमटा खरीदने की समझ हो पर अपना बचपन की ख्वाहिशो को समेटना न पड़े।

देश में समस्याओं की अमावस्या को दूर करने हेतु एक दीपोत्सव हो



असतो मा सदगमय ।

तमसो मा ज्योर्तिगमय ।

मृत्योर्मा अमृतं गमय ।


असत से सत्य की ओर बढ़ना भी प्रकाशित होने के समान है। मृत्यु से अमरता की राह भी मानव की आत्मा को प्रकाशित करती है। वस्तुतः हमारा हर क्षण जब हम सीखते है ,जब हम असफल होते है ,हमें सही ज्ञान की ओर अग्रसर करता है ,यही तो हमारा अन्त:करण का प्रकाश है। मानव जीवन एक प्रकाश पुंज है।

प्रकाश की बात करने का मेरा सीधा मन्तव्य  आने वाले प्रकाशोत्सव से है। कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाने वाला यह पर्व दीपावली कहें या दीपोत्सव कहें या प्रकाशोत्सव का सीधा महत्व हमारे इतिहास से है , प्रभु श्री राम अपने चौदह वर्ष की वन गमन यात्रा को पूर्ण कर इस धरा को राक्षसों से रहित कर अवध पहुँचे।अवध वासियों के लिये तो यह अविस्मरणीय दिन था, राम के लौटने की खुशी किसी उत्सव से कम नहीं थी। अवध में दीपोत्सव मनाया गया ,अमावस्या की काली रात्रि दीपों में कही विलुप्त हो गयी,दीपों की कतारों ने चौदह वर्ष राम के वियोग का दुख क्षण भर में ही समाप्त कर दिया।
प्रकाशोत्सव का वर्तमान स्वरूप थोड़ा बदला जरुर है,पर उसमें उत्साह खुशियाँ वैसी ही है।बिजली से चलने वाले दीपों की झालरों की रौनक ,विभिन्न प्रकार की आतिशबाजी इस उत्सव की रौनक को और बढ़ा देती है।

फिर भी मन में एक प्रश्न बार बार यही उठता है,कि क्या यही प्रकाशोत्सव स्वरूप है?

आज भी समाज का एक हिस्सा रोटी के लिये भूखा सो जाता है नारी की रक्षा भी एक मुद्दा बनकर रह गयी है।हम धर्म को राजनीति का विषय बनाकर बेवजह लड़ रहें है  मुद्दा होना चाहिए,हम प्रकाश की बात कर रहें है,लोग आग लगाने को तैयार बैठे है।देश की समस्याओं का हल मिलें न मिलेंं,रोज चैनलों पर चर्चा सुनिए ,आपको लगेगा हर प्रवक्ता अपनी पार्टी को बचा रहा है।यहाँ पर मेरा आशय यह था कि देश की समस्याएँ भी अमावस्या की रात्रि के समान घनी होती जा रही है उन्हें दूर करने के लिये भी किसी दीपोत्सव  को जीवंत किया जाना आवश्यक है।

माना कि अंधकार गहरा घना है लेकिन एक दीप जलाना कहा मना है

हर किसान आज होरी है

हिन्दी साहित्य के ध्रुव के रुप में प्रेमचंद की कालजयी रचनाएँ वर्तमान जीवन के यथार्थ के रुप में परिलक्षित होती है। एक कहानीकार के रुप में उनकी कहानियाँ आदर्शवादी दृष्टिकोण लिये समाहित है। पर उनकी अन्तिम रचना
के रुप में गोदान को अगर हम देखें, तो उसमें आदर्शवाद के रुप में होरी और धनिया अपने धर्म और अपनी गृहस्थी को मर्यादित रखने का जो चरित्र दोनों का है।कहानी का अन्त उतना ही आदर्श के पथ की किकर्तव्यमिमूढ़ता को प्रदर्शित करता ।
होरी जो जीवन पर्यन्त गाय को पालने की जीजिविषा के साथ जीता रहा ,मृत्यु तक उसका यह स्वप्न एक स्वप्न ही बनकर रह गया। यहाँ तक जब उसकी मृत्यु पश्चात गौदान की बात कही गयी, जो धनिया के लिये असम्भव था,उसका कुछ सिक्के देते हुए ये कहना कि यही इनका गौदान है।
प्रेमचंद ने गौदान में भारतीय किसान की जिस मार्मिकता को वर्णित किया है, वह बहुत ही करुण है।
आज भी होरी जैसे किसान है,जो ऋण की अग्नि में मजबूर है जलते रहने को।जो किसी न किसी तरह उनको मृत्यु के पास ले जा रही है,आत्महत्या या ऋण न चुका पाने का भय उनके जीवन को विष की भाँति शनैः शनैः निगल रहा है।
प्रेमचंद के गोदान में भारतीय किसान की पीड़ा किसी प्रसव पीड़ा से कम नही दिखाई पड़ती।जो वर्तमान किसान की भी दशा को वर्णित कर रही है। किसान की यह दशा अभी कब तक यूंही जारी रहेगी ,इसका भी समुद्र मंथन होना जरूरी है।

श्रीरामचरितमानस


काव्य ग्रन्थ, गद्य ग्रन्थ, किसी भी समाज की संस्कृति की आधारशिला होती है, संस्कृति, संस्कार, त्याग, समर्पण समाज के प्रारूप को दर्शाते है, प्रभु रघुनन्दन श्रीराम भारतीय समाज के पटल पर अंकित एक दैदिप्यामान आभा है, जिसकी रश्मियाँ सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को आलोकित कर रही है।
महान संत बाबा गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित काव्य विधा श्री रामचरितमानस समस्त दैहिक-दैविक-भौतिक तापों से उत्पन्न होने वाली पीड़ा का दहन करने वाली एक रिमझिम फुहार है। परिवार का प्रारूप, उसमे होने वाले हर्ष,संताप को दर्शाने वाली एक अनमोल कृति है.श्री हरि नारायण के अवतार श्रीराम प्रभु के  मातृ- पितृ प्रेम को दर्शाती एक  त्याग, समर्पण, प्रेम की अनुपम काव्य कथा है। प्रभु श्रीराम का आचरण, उनका जीवन चरित, और उनके व्यवहार, प्रवृति के अनुरूप उनके भ्राताओं का समरुप व्यवहार है,श्रीरामचरितमानस।

 श्रीराम प्रभु से जुड़ा हर पात्र त्याग,  निष्ठा, समर्पण, भक्ति, आस्था, विश्वास से परिप्लावित है, द्वेष, आसक्ति, लोभ,मोह का कोई स्थान ही नहीं। रघुनाथ से जुड़ा हर कोई अपने अपने स्थान पर रहकर केवल जनहित, लोकहित को अपना परम कर्तव्य मानकर जीवन रथ पर आरुढ़ हो केवल तप कर रहा हैं।

माँ जानकी एक राजा की राजकुमारी, चक्रवर्ती सम्राट और साम्राज्य की कुलवधु होकर भी अपने स्वामी के चरण कमलों का अनुसरण करते हुए वन गमन को चली गयी, भ्रात लक्ष्मण सेवक के कर्तव्य को सर्वोपरि मानकर रघुवर के पद चिन्हो को धारण कर वन चले गए,भरत के जैसा अनुपम त्याग का उदाहरण शायद ही कही देखने को मिले जिन्होंने राजधानी में रहकर वल्कल वस्त्र धारण कर 14 वर्षो तक प्रतीक्षा की, लखन प्रिय उर्मिला पति के कर्तव्य पथ पर जिसने अपने जीवन स्वपनों  की आहुति दें दी।

माँ शबरी का श्रीराम प्रभु में परम विश्वास उसकी प्रतीक्षा , विभीषण का श्री हरि चरणों में अनुराग, पक्षीराज जटायु का श्री राम भक्ति करते हुए माँ जानकी की राक्षस रावण से रक्षा करते हुए अपने प्राणों का बलिदान,बजरंगबली हनुमान की भक्ति  का सार है, श्रीरामचरितमानस। बजरंगबली तो एकमात्र ऐसे पात्र है, जिन्होंने स्वहित की अपने जीवन यज्ञ में आहुति दें दी, उनका परम कर्तव्य, उनका प्रेम, अनुराग उनका समर्पण केवल अपने उपास्य के लिए,  केवल श्रीराम। भक्ति का ऐसा चरमोत्कर्ष उदाहरण शायद ही कही हमें देखने को मिले, भक्ति और शक्ति के शिरोमणि श्री हनुमान जी।

भगवदगीता अगर कर्म करते हुए भगवद आचरण करने की शिक्षा देती है, तो श्रीरामचरितमानस पारिवारिक जीवन में त्याग, निष्ठा, प्रेम और समर्पण  का मार्ग दिखाती है। श्रीराम को जो भी मिला, उन्होंने उसे सहर्ष उसे स्वीकारा, सतत जीवन में वे पीड़ा , वन के दुखो और कष्टों को सहकर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम बन गए।

संत श्री तुलसीदास बाबा ने यह अमर काव्य कृति लिखकर लोक मंगल की जो अमर गंगा इस पृथ्वी पर प्रवाहित की है, वास्तव तुलसीदास जी भगीरथ है, जो श्रीराम रूपी गंगा को श्री रामचरितमानस के रूप में लाकर समस्त जीव जगत को इस अंध कूप से तारने हेतु एक ब्रह्म नौका प्रदान की है.



सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।
सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान
माँ शबरी का परम विश्वास उसकी प्रतीक्षा , विभीषण का श्री हरि चरणों में अनुराग श्री बजरंगबली हनुमान की भक्ति  का सार है, श्रीरामचरितमानस। बजरंगबली तो एकमात्र ऐसे पात्र है, जिन्होंने स्वहित की अपने जीवन यज्ञ में आहुति दें दी, उनका परम कर्तव्य, उनका प्रेम, अनुराग उनका समर्पण केवल अपने उपास्य के लिए,  केवल श्रीराम। भक्ति का ऐसा चरमोत्कर्ष उदाहरण शायद ही कही हमें देखने को मिले, भक्ति और शक्ति के शिरोमणि श्री हनुमान जी।

भगवदगीता अगर कर्म करते हुए भगवद आचरण करने की शिक्षा देती है, तो श्रीरामचरितमानस पारिवारिक जीवन में त्याग, निष्ठा, प्रेम और समर्पण  का मार्ग दिखाती है। श्रीराम को जो भी मिला, उन्होंने उसे सहर्ष उसे स्वीकारा, सतत जीवन में वे पीड़ा , वन के दुखो और कष्टों को सहकर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम बन गए।

संत श्री तुलसीदास बाबा ने यह अमर काव्य कृति लिखकर लोक मंगल की जो अमर गंगा इस पृथ्वी पर प्रवाहित की है, वास्तव तुलसीदास जी भगीरथ है, जो श्रीराम रूपी गंगा को श्री रामचरितमानस के रूप में लाकर समस्त जीव जगत को इस अंध कूप से तारने हेतु एक ब्रह्म नौका प्रदान की है.

सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।
सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान

ईश्वरीय गीत है भगवदगीता

जीवन में कई प्रसंग ऐसे आते हैं जब हमें समस्याएँ सुलझाने , स्वयं से लड़ने के लिए एक जीने कि इच्छा की आवशकता होती हैं. और जिसके लिए हमें स्वयं में एक ऊर्जा उत्पन्न करनी होती हैं. मानव जब तक निस्तेज हैं वह एक शव के सामान हैं. भगवद्गीता वर्तमान समय में मानव जीवन की समस्याओ को दूर करने का सूर्योदय हैं , जो न केवल हमें जीवन आधार प्रदान करती हैं. वरन आध्यात्म की तरफ भी जीवन को अग्रसर करता हैं. गीता में समस्याओ को बहुत ही सरल ढंग से परिभाषित किया गया हैं. और उनके समाधान के तरीके भी उतने ही सहज दर्शाये गए हैं , बस आवश्यकता हैं , उन्हें सही तरीके से जीवन में उतारने की. गीता में निहित इन तरीको को अपनाने से आप सुखद जीवन का अनुभव करेंगे. "कर्म करने के लिए विजयी बनो ,विजयी होने के लिए कर्म नहीं": किसी कार्य को करने का आनंद इस बात में निहित हैं कि आप कार्य को कितने उत्साह एवं एकनिष्ठ होकर करते हैं. सिर्फ परिणाम को सोचते हुए कर्म करना आपके उत्साह को क्षीण भी कर सकता हैं, और यह भय आपको की परिणाम आपके पक्ष में होगा या नहीं आपके कर्म को प्रभावित कर सकता हैं.कर्म करो फल की इच्छा मत करो ,इसका सारगर्भित अर्थ यही हैं कि आप आनंद का अनुभव करते हुए कर्म करो.उदहारण के तौर पर कवि अपनी कविता के प्रकाशन या आलोचना को ध्यान न रखते हुए सिर्फ कविता लिखते हुए आनंद कि अनुभूति करता हैं,और यही आनंद उसकी कविता का फल हैं. "शत्रु स्वयं में हैं उसे बाहर न तलाशे ,स्वयं से युद्ध करने का साहस उत्पन्न करें": मानव स्वाभाव सकारात्मक नकारात्मक दोनों ही प्रवित्तियो का स्वामी हैं.और यही दोनों शक्तियाँ उसे सुमार्ग और कुमार्ग पर ले जाती हैं. अधिक अच्छाई भी हमारे अंदर दोष उत्पन्न कर सकती हैं,स्वयं पर अभिमान करने का. अर्जुन ने जब अपने सगे सम्बन्धियों से युद्ध करने में असमर्थता जताई, तो कृष्ण ने उसे भगवद्गीता कि गंगा से उसे स्वच्छ कर दिया और उसे प्रेरणा दी कि अपने विकारो से लड़ना ही स्वयं पर जीत हासिल करना हैं ,जो विकारो पर जीत हासिल नहीं कर सका वह जीवन में सुखी होते हुए भी दुखी हैं. "त्वरित किसी परिणाम को न मान लें ,उसका शोध भी आवश्यक हैं":किसी भी समस्याओ को सुलझाने चाहे वे स्वयं से जुडी हो या दूसरे से सम्बंधित हो ,सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह हैं कि आप ध्यान और पूरे मनोयोग से बातो को सुनें,त्वरित किसी परिणाम को बताकर किसी भी कार्य का मूल्यांकन करना कार्य के साथ अन्याय होगा.और सबसे महत्वपूर्ण पहलू जीवन में चुनौतियां कितनी भी हो,हम निराशा में भी ईश्वर के प्रति एकनिष्ठ होकर दुःख में भी सुख कि अनुभूति करेंगें, समस्याओ का सही तरीके से मूल्यांकन हमें उनके सुखद पहलू के बारे में भी अवगत करता हैं. "जीवन में स्पष्ट दृष्टिकोण आवश्यक हैं, गलत दृष्टिकोण विवेक को नष्ट करता हैं": दुर्योधन और धृतराष्ट्र में सबसे समान पहलू ये था कि धृतराष्ट्र जन्म से जन्मांध थे दुर्योधन आँख होते हुए भी अंध था,क्योकि जब मनुष्य का विवेक नष्ट हो जाये तो वह सही और गलत में भेद करने में असमर्थ हो जाता हैं, और यही दृष्टिहीनता उसके दुर्भाग्य का कारण बनती हैं.स्पष्ट दृष्टि हमें समस्या से लड़ने कि चुनौती देती हैं,जबकि गलत दृष्ट्रिकोंण हमें समस्याओं के चक्रव्यूह में डाल देता हैं. भगवद्गीता को हम अविरल बहने वाली गंगा कहे तो कोई गलत नहीं होगा ,जो हमारे मलिन मन को स्वच्छ कर हमें आगे बढ़ने कि प्रेरणा देती हैं ,और हमारे दृष्टिकोण को सूर्य के तेज के समान साफ़ और हमारी दृष्टि को उज्जवल रहती हैं,एक स्वच्छ और स्पष्ट जीवन का आनंद लेने के लिए

प्रेम का अनुरागी मन

तुम असिमित विस्तार हो मेरे स्वप्नों का 
अधूरी आकांक्षाएं लिये मेरे बोझिल नैन 
किसी निशब्द रात्रि के साथ तुम्हारे स्वप्नों के प्रांगण में उतरकर कोई पूर्ण होते ख्वाब को देखकर ठहर गये हो
 श्वेत चाँदनी सी जो तुम्हारी पैरों की नूपुर
 मेरे मन के आँगन में एक मधुर स्वर की झंकार करते 
मेरे प्रेम को पल्लवित करती
मैं अलसायी आँखों को मूंदकर 
अपने अनकहे शब्दों को अधरों में समेट लेता हूँ 
 तुम्हारे प्रेम का अनुरागी मन 
चंचलायमान होकर भी कितना स्थिर है 
स्थिरता तुम्हारी कितनी प्रवाहपूर्ण है और 
मुझमें वेग होकर भी कितना तटस्थ हूँ मैं
 प्रेम का प्रवाह कितना स्थितप्रज्ञ है 
जो बह रहा है किन्तु स्थिर है

Monday, 2 October 2017

इंसा होने की शर्त

तुम धर्म जाति की बात करो
मैं इंसा होने की शर्त लगाता हूँ
तुम ख्वाहिश रखो सत्ता की
मैं रोटी की खोज में जाता हूँ
तुम नीति नियम की बात करो
मैं उजड़ों की बस्ती बसाता हूँ
तुम निंदा कटाक्ष के वचन बुनो
मैं पीड़ा के दंश मिटाता हूँ
मन्दिर मस्जिद की बात करो
मैं मानव का धर्म बताता हूँ
तुम अधिकारों का मार्ग रचो
मैं कर्तव्य पथ में जाता हूँ
तुम सागर सा खारा बन जाओ
मैं नीर नदी का बन जाता हूँ
तुम व्यापारी बन जाओ
मैं कृषक बन अन्न उगाता हूँ
तुम जज बनकर तो न्याय करो
मैं गीता पर हाथ रख कसम खाता हूँ